आधुनिक युग की शुरुआत में, जब यूरोप में इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन की लहर उठ रही थी, तब केवल मशीनें और फैक्ट्रियाँ ही नहीं बन रही थीं, बल्कि देशों की पहचानें (Identities) भी गढ़ी जा रही थीं। उस समय यूरोप की लगभग हर बड़ी शक्ति अपने अतीत को गौरवशाली साबित करने में जुटी हुई थी।
फ्रांस बार-बार यह दावा करता था कि रेनेसां की शुरुआत उसी की धरती से हुई। ब्रिटेन अपने विशाल साम्राज्य पर गर्व करता था और कहता था कि “हमारे साम्राज्य में सूर्य कभी अस्त नहीं होता।” इटली रोमन एम्पायर की विरासत का हवाला देकर खुद को यूरोपीय इतिहास का केंद्र बताता था।
लेकिन इसी यूरोप के बीचों-बीच एक देश था—जर्मनी, जिसे इन सब शक्तियों द्वारा नीची नज़र से देखा जाता था। उसे “बार्बेरियन”, “जंगली”, “इतिहासविहीन” और “गुंडों का देश” कहा जाता था। जर्मनी के पास न तो कोई एकीकृत साम्राज्य था, न कोई ऐसा गौरवशाली अतीत जिसे वह गर्व से दिखा सके।
जर्मनी की पहचान की खोज और इंडोलॉजी की शुरुआत
18वीं सदी के आसपास (1700–1730 के बीच), जर्मनी में एक बड़ा बौद्धिक परिवर्तन हुआ। जर्मनी छोटे-छोटे राज्यों में बँटा हुआ था, लेकिन वहाँ के विद्वानों ने यह महसूस किया कि यदि उन्हें यूरोप में सम्मान चाहिए, तो उन्हें एक इतिहास गढ़ना होगा।
यहीं से जर्मन स्कॉलर्स ने विश्व इतिहास की ओर रुख किया, और इसी खोज ने उन्हें भारत तक पहुँचा दिया। भारत के वेद, संस्कृत भाषा और प्राचीन ग्रंथों ने उन्हें चौंका दिया। यहीं से जर्मनी में एक नई अध्ययन शाखा जन्म लेती है—इंडोलॉजी।
मैक्स म्यूलर, ह्यूस्टन स्टुअर्ट चेम्बरलेन, जोसेफ गोबिन्यू जैसे स्कॉलर्स ने भारत में रहकर वेदों और संस्कृत का अध्ययन किया। लेकिन यह अध्ययन निष्पक्ष नहीं था। उन्होंने संस्कृत और वेदों से कुछ शब्द उठाए—जैसे “आर्य”—और उन्हीं शब्दों के आधार पर एक नई यूरोपीय पहचान गढ़नी शुरू की।
‘आर्यन’ नैरेटिव और भारतीय इतिहास का अपहरण
जर्मन स्कॉलर्स ने यह दावा करना शुरू किया कि संस्कृत और वेद भारत के नहीं हैं। उनके अनुसार, संस्कृत एक यूरोपियन भाषा है और वेदों की रचना भी यूरोप से आए लोगों ने भारत में की।
यहाँ तक कहा गया कि जीसस क्राइस्ट भी आर्यन थे। यह सब बिना किसी वैज्ञानिक या पुरातात्विक प्रमाण के किया गया—केवल थ्योरी और नैरेटिव के सहारे।
जबकि वास्तविकता यह है कि वेदों में सरस्वती सभ्यता का वर्णन है, ऋषियों की वंशावलियाँ हैं, और आज भी भारत में उन ऋषियों की वंश परंपराएँ जीवित हैं। फिर भी यूरोप ने, विशेषकर जर्मनी ने, भारतीय ज्ञान को अपनी पहचान बनाने के लिए हाईजैक किया।
ब्रिटिश साम्राज्य और द्रविड़–आर्य विभाजन
जर्मनी जहाँ पहचान बना रहा था, वहीं ब्रिटेन भारत में डिवाइड एंड रूल की नीति को और परिष्कृत कर रहा था।
ब्रिटिश शासन के दौरान रॉबर्ट कैल्डवेल नामक एक क्रिश्चियन मिशनरी को दक्षिण भारत भेजा गया। उसने दक्षिण भारत का दौरा किया और एक नया नैरेटिव गढ़ा—द्रविड़ बनाम आर्य।
दक्षिण भारत के लोगों को बताया गया कि:
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वे उत्तर भारत से अलग हैं
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उनकी भाषा, संस्कृति और सोच अलग है
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उत्तर भारत के लोग “आर्य” हैं
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संस्कृत और हिंदी “आर्यों की भाषा” है
धीरे-धीरे यह नफरत भाषा से शुरू होकर लोगों तक पहुँची। पहले आर्यों से घृणा, फिर उत्तर भारत से, फिर संस्कृत से और अंततः हिंदी से।
1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि भारत फिर कभी एकजुट न हो सके। उत्तर–दक्षिण विभाजन इसी रणनीति का हिस्सा था।
द्रविड़ पहचान और धर्मांतरण का बीज
इस विभाजन के साथ-साथ ब्रिटिशों ने एक और चुपचाप खेल खेला। द्रविड़ों को यह बताया गया कि वे न केवल आर्यों से अलग हैं, बल्कि क्रिश्चियनिटी के अधिक निकट हैं।
यही कारण है कि आज दक्षिण भारत में कई लोग सनातनी नाम रखते हुए भी ईसाई धर्म का पालन करते हैं। यह पहचान का भ्रम औपनिवेशिक काल की ही देन है।
कार्ल मार्क्स और क्रांति की नई भाषा
इसी ऐतिहासिक कालखंड में एक और विचारक उभरा—कार्ल मार्क्स। उसने समाज को देखने का एक नया फ्रेमवर्क दिया:
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समाज में एक ऑप्रेसर होता है
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एक ऑप्रेस्ड (पीड़ित) वर्ग होता है
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इनके टकराव से क्रांति जन्म लेती है
मार्क्स का फोकस आर्थिक शोषण पर था। लेनिन ने इसी विचार को रूस में लागू किया और 1917 की क्रांति हुई।
फ्रैंकफर्ट स्कूल और ‘क्रिटिकल थ्योरी’
रूसी क्रांति के बाद 1920 के दशक में जर्मनी के फ्रैंकफर्ट शहर में कुछ मार्क्सवादी स्कॉलर्स इकट्ठा हुए। उन्होंने Institute of Social Research की स्थापना की, जिसे आगे चलकर फ्रैंकफर्ट स्कूल कहा गया।
इनका तर्क था कि हर देश में आर्थिक शोषण जैसी स्थितियाँ नहीं होतीं, इसलिए क्रांति लाने के लिए कल्चर और समाज को निशाना बनाना चाहिए।
1933 में हिटलर के सत्ता में आने के बाद ये सभी स्कॉलर अमेरिका भाग गए और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में Critical Theory के नाम से अपनी सोच को आगे बढ़ाया।
क्रिटिकल थ्योरी: समाज सुधार या समाज विघटन?
क्रिटिकल थ्योरी का दावा था कि वह समाज को बेहतर बनाएगी, लेकिन असल लक्ष्य था:
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समाज की परंपराओं को कमजोर करना
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संस्कृति में दरारें पैदा करना
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पीड़ित–शोषक का स्थायी नैरेटिव बनाना
अमेरिका में इसकी पहली प्रयोगशाला बनी Critical Race Theory, जहाँ गोरे लोगों को ऑपरेसर और काले–ब्राउन लोगों को स्थायी विक्टिम बताया गया।
भारत में क्रिटिकल थ्योरी का अनुप्रयोग
1947 के बाद भारत में भी यही फ्रेमवर्क अपनाया गया:
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द्रविड़ बनाम आर्य
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दलित–ओबीसी बनाम ब्राह्मण
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कश्मीर बनाम भारत
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खालिस्तान बनाम हिंदू स्टेट
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ट्राइबल बनाम हिंदू समाज
हर जगह वही भाषा:
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“हम ऑपरेस्ड हैं”
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“वो ऑपरेसर हैं”
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“आउटकम चाहिए—सेपरेटिज़्म, आंदोलन या हिंसा”
आज हिंदी विरोध, जाति जनगणना, खालिस्तान, कट्टरपंथी आंदोलन—सब इसी क्रिटिकल थ्योरी के ढांचे में फिट बैठते हैं।
निष्कर्ष
यह लेख किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि एक वैचारिक रणनीति को समझने के लिए है। इतिहास, भाषा और संस्कृति को हथियार बनाकर समाज में फॉल्ट लाइन्स बनाई जाती हैं।
यदि भारत को मजबूत रहना है, तो हमें इतिहास को भावनाओं से नहीं, बुद्धि से पढ़ना होगा। पहचान गढ़ी नहीं जाती, समझी जाती है। और जब तक हम यह नहीं समझेंगे कि ये विभाजन कैसे बनाए गए, तब तक हम उन्हीं के शिकार बने रहेंगे।